शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

नमी, पत्थर और सोना

(1) 
आँखें नम होती थीं, तुम पत्थर के थे। 
चौंधियाती हैं अब, सोने के हो गये हो। 

(2) 
नमी को चाहिये था सहारा, तुम्हें पत्थर में तराशा।
सहारे ने दिया ठसक ठिकाना, तुम्हें सोने से मढ़ दिया।