गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

और वे मंत्र हो गये!

समझता हूँ स्पर्श तुम्हारे नयनों के 
लालिमा फूटती भी है गह्वर में 
उलझा निज विधा सायास 
रोकता हूँ रुख तक आने से 
आ गयी जो 
नयन वही होंगे तुम्हारे 
किंतु स्पर्श खो जायेंगे 
तुम्हारा यूँ निहारना मुझे 
रुचता है, मोहता है 
मैं खोना नहीं चाहता 
रोकता हूँ लालिमा निज की इसलिये।
जाने कितने क्षण अक्षण हुये 
ऐसे में कुछ किया नहीं मैंने 
बस अपने गीतों को 
तुम्हारा नाम दिया 
और वे मंत्र हो गये!
_______________

~ गिरिजेश राव 

शनिवार, 23 नवंबर 2013

हुई लाल!



साँझ को 
निशा निमंत्रण 


सूरज ने फेरा हाथ 
गोरी गंगा लाज 

हुई लाल! 

रविवार, 10 नवंबर 2013

आवश्यक है रचना

आवश्यक है रचना एक शृंगार कविता 
तुम्हारी कमर सीधी करती भंगिमा पर
जैसे आवश्यक है तुम्हारा मुस्कुराना 
ऐनक काँच जमी मेरी अंगुलियों पर 
ये दवा हैं उस रोग की जिसे आयु कहते हैं 
आयु देह की नहीं, आयु मन की नहीं 
आयु प्रेम की जिसकी हर साँस पहरे हैं - 
वाद के, कृत्रिम उपचार के, कथित यथार्थ के
आवश्यक है झूठ होना, दुखना, दुखाना
इस युग तो सही सुख की बातें सभी करते हैं!

बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

साखी

रात नम तुम्हारे होठों की तरह
लाज की बात है आँखें मूँदनी हैं
मुझे चूमनी हैं साँसें अंधकार में
ऊष्ण उड़ेगी निविड़ में प्रीत सन
प्रात कसे जग हमें जो शुचिता पर
साखी होंगी बूँदें टँगी दूब पर!
___________
- गिरिजेश राव 201310302254 

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

सूर्या सोम

भोर दिखा
भर निशा जागा सोम
मुस्कुराता
~~~~~~

2013-10-25-1090 - Copy
अवगुंठन जगी साँवरी सूर्या साथ
चमक रही माँग रोली नवविवाह
प्रात पूर्ण उद्योग
~~~~~~~~~~~

2013-10-25-1093
प्रस्फुर उल्लास बदन वदन
उमंग साँवरी देह हिरण्य द्युति
संगति साजन उपहार कंचन कंचन
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

द्वितीयोनास्ति प्रेम समर्पण
सोम दृग चन्द्रिकामृत अंग अंग
सूर्या गौर तेजस्विनी निज हिरण्य समो     

शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

उसकी श्रुतियाँ

उसने कहा -
तुम अभिशप्त हो
भ्रष्ट आत्मा हो

उस क्षण मुक्त हुआ
उसके रँगे काषाय को ओढ़
यायावर निकल पड़ा

प्रेम यदि मिलना मिलाना है
तो उसका कहना अभिशाप नहीं

प्रेम यदि एकांत है
तो उसका कहना भ्रष्टाचरण नहीं

यही सोच मैं द्वैत हुआ
उसे क्षमा किया

और वह पुन: मिली
कहा - तुम्हें सुनना है

ये जो शब्द हैं
मेरे मौन हैं

उसकी श्रुतियाँ हैं   

शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

बात कीजिये हुजूर

अन्न की बात कीजिये हुजूर
देवालय की अक्षत हो
या शौचालय की मल मल
उसे तो होना है जरूर
रोटी की बात कीजिये हुजूर
बहुत पहले ही उतर चुका
ऐसे नारों का शुरूर
घट्टा पड़ चुकी हैं आदतें
हँसते हैं बन के चूतिया
हम जाहिल मगरूर
फिर भी जलन नहीं होती सहन
होती है जो पेट में मजबूर
लगने पर देख लेंगे
पहले लगाइये तो हुजूर
अन्न की बात कीजिये हुजूर!

शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

शरद की प्रात

शरद की प्रात शीतल ओसमयी
चूमा है जगते ही बासी मुँह
धरा ने निठुराये आकाश को

ठिठुरन है या है तन में झुरझुरी
प्रेम बैठता पगता भीनता सा
उड़ेलता कोई माटी के नवघट इक्षुरस

मिचमिची आँखें बदनपीर राम राम
टूटती अँगड़ाइयाँ सन अंग अंग
लिप्त हैं दोनों आदिम आराधना में   

सोमवार, 2 सितंबर 2013

सुन मीता मेरे!

सुन मीता मेरे
चुक जाय जब मसि मेरी लेखनी में
मेरे बीते अक्षर पढ़ना।
अनमना हूँ पर हूँ तुम्हारे साथ सर्वदा
तुम मेरी कहानी कहना।

तुम्हारा कहना
खुलना होता है तिरस्करिणी का
मुझे दिखता है वह जिसे तुम ईश्वर कहते हो
खिलते हैं उन क्षण अनकहे हरित से कुछ
मैं होता हूँ स्तब्ध

चुप रहूँ तो मुझे निज शब्द सुनना
मीता मेरे!
वही है वह प्रार्थना जो तुम हो मेरे लिये


गुरुवार, 22 अगस्त 2013

मृत्यु का जन्म

...और तब उसने स्वयं को काट कर आधा किया
उसे अलग किया जिसे वह प्रेम कर सके
उस दिन मृत्यु का जन्म हुआ।

बस एक किरकिरी

सब ठीक है देश में
सिवा एक किरकिरी के
जिसने हर पलक
हर झपक
को अवांछित कर रखा है
आँखें हैं कि हर पल खुली नहीं रह सकतीं
दृश्य में, देखने में, दिखाने में आनन्द नहीं
बन्द रहें तो भी कैसे
बस एक किरकिरी ने
हर पलक को दुखी कर रखा है! 

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

मंगलदीप जले जब घर में
मुझे हवा का झोंका समझना
तुम दीप बचाना
सहेजूँगा मैं हाथों की तपिश
और कपोलों पर बह जायेगा
मलयानिल। 

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

बाथरूम के तौलिये

बाथरूम के तौलिये -
सफेदी एक
ग़ुणवत्ता एक।
एक करता है अंतरंग आलिंगन
दूसरा पाँवों तले कुचला जाता।
- अपना अपना भाग्य -

अगले दिन
स्थिति उलट
- समय का फेर -  


गुरुवार, 25 जुलाई 2013

बस स्टॉप पर लड़की



2013-07-25-767
उछालती हैं गाड़ियाँ
धूल दिन भर
पथ की पटरी पर
सनती है स्वच्छ स्निग्ध टाइल
पिल्ले तक नहीं बैठते।

प्रात:काल बस स्टॉप पर
धूल सनी पटरी से लगे
बोझ उठाये हम रहते हैं
सहमे से खड़े
बैठें कैसे? होंगे कपड़े मैले।

वह आती है
लाल साँवली लड़की
बस्ता पीठ पर लादे
हाथों में लिये पुराने पेपर।
हमें देख मुस्कुराती है
बिछाती है
करीने से पुराने पेपर
धूल सनी टाइलों पर।
दब जाती है एलर्जी धूल
उसके चेहरे से झरते हैं अनुरोध फूल
बस्ता रख सब बैठ जाते हैं
तब वह बैठती है
मुस्कुराती करती है प्रतीक्षा बस की,
आने जाने वालों को देखते हुये।

यह रोज का मामला है -
सँवारती हैं, सहूलियतें लाती हैं
मुस्कुराती लड़कियाँ
आँचल फैलाती
चुपचाप स्त्रियाँ
और जिन्दगी यूँ ही चली जाती है।

पथ की धूल सनी पटरी पर
बासी इबारतें बिछाती हैं
ठाँव के लायक बनाती हैं
मुस्कुराती हैं
स्टॉप पर लड़कियाँ!

शनिवार, 6 जुलाई 2013

कितना कमाते हो?

मैं जानता हूँ मित्र!
असमर्थ हूँ, व्यर्थ हूँ,
कुछ नहीं कर सकता
यह तंत्र बदलने को

लेकिन अच्छा लगता है जब
मेरी टेबल पर आश्वस्ति पाते हो

उपलब्धि लगती है कि
तुम्हारे चेहरे से सलवटें मिटती हैं
पसीना पोंछते नहीं
मुस्कुराते हुये जाते हो

मन ही मन उत्तर देता हूँ
सहस्र जिह्वा एक प्रश्न का
"कितना कमाते हो?" 

सोमवार, 3 जून 2013

तोड़ कर सारे प्रतिमान
मैंने डाल दिये हैं समय के कूड़ेदान में
जिन्हें कोई भाव न दे
उन्हें दान दे अपना अहं पोषित होता है।

छ्ल है यह लेकिन छ्लना जीवन रीति है
विकास है, बाढ़ है, परिवर्तन है
जीवन धन है छलना
मरने के बाद कौन छला जाता है?
कौन छल पाता है?
प्रतिमान तो बस जीवन के लिये हैं।

मरना निरपेक्ष है
धुकधुकी बन्द हुई
साँसों का कोटा चुका
और
हो गये सपाट लमलेट
प्रतिमान निरपेक्ष!
अहं मुक्त सम्भवा
वा या किं वा।

रविवार, 26 मई 2013

हाथ बचाया दोना है

ये जो रोना धोना है
यूँ ही पानी खोना है। 
देवों को परसादी दे 
हाथ बचाया दोना है। 
मीठी मुस्की माशूका
माँ तो बस लोना है।

कभी ऐसा कभी वैसा
इंसाँ जादू टोना है।
चन्दा चाँदी रात भर
दिन तो बस सोना है।  
फूले थे जो सूख गये
पतझड़ काँटे बोना है।

शुक्रवार, 24 मई 2013

धूमिलोत्तर : लोहे का स्वाद


लोहे का स्वाद लोहार से न पूछो जो गढ़ता है
लोहे का स्वाद घोड़े से न पूछो जो पहनता है
लोहे का स्वाद सवार से न पूछो जो चढ़ता है।
लोहे का स्वाद उस ईमानदार से पूछो जो
कार्बन प्रतिशत सीमा से बाहर होने पर भी
ठीक दर्ज करता है, बैच पास कर खुद पर कुढ़ता है
चुप्पी का तेजाब मुँह में रख गलता है
और हर शाम खुद को सांत्वना देने को गीता पढ़ता है।


('लोहे का स्वाद' सुदामा पांडेय 'धूमिल' की अंतिम कविता है। उनसे क्षमा सहित।)


शनिवार, 18 मई 2013

ऐसे भी


चिपके केश स्वेद सने ललाट पर
उठी चुम्बन चाहना अ-काम
झिझका ठिठका सकाम सोच
तुम क्या कहोगी, लोग क्या कहेंगे
उमगा क्षार नयन द्वार टपकी बूँदें
कपोलों को ऐसे भी भीगना था -
अवशता पर! 

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

कहना

वो जीने को काम तमाम कहना
मैं सुबह कहूँ तो शाम कहना
खुश होना और बहुते खराब कहना
थे सलामी को राजी वे पहली नज़र
मैंने देरी से जाना आदाब कहना! 

रविवार, 7 अप्रैल 2013

घर से भागे रूठे बच्चों की तरह


तुम्हारी स्मृतियाँ -
घर से भागे रूठे बच्चों की तरह।
जब आती हैं वापस
घर सँवरता है
बनते हैं तरह तरह के पकवान।
डाइनिंग टेबल पर जो धूल थी ही नहीं;
पोंछ दी जाती है।
नमकदानी की सीलन
ग़ायब होती है।
स्वाद छिड़कने को
मिर्चदानी उठाई जाती है।
भोजन के बाद
थाली की जूठन में
चित्रकारी करती हैं अंगुलियाँ
लिखती हैं एक नाम
और
स्मृतियाँ
चली जाती हैं डिनर के बाद-
उन्हीं रूठे बच्चों की तरह।
वही पुरानी शिकायत-
नाम ग़लत क्यों लिखा?

महुवा

झुकी घनेरी केशराशि
महुवा फूले बरगद गाछ।
महुवा महुवा - साँसें बोझिल
महुवा महुवा - थकी देह
महुवा महुवा मद - मचले मन
महुवा महुवा - गेह गेह!

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

उमसते प्रात में साँवरी

प्रातकी सूख गई,
केश तुम्हारे हुये गीले
नयनों ने चित्र टाँके,
फूल छिटके नील पीले।

अधर लाली खुल गई,
श्वेत बेला झाँकती
गन्ध मधुरा साँस दहका
निकटता राँधती।


साँवरे कपोल मस्तक,
ओस फूटे स्वेदकूप
रक्त चन्दन ऊष्ण उमगे
रूपसी रूप रूप।

थम गयी कामना,
निहारती आराधना
देह भीगे ग्रीष्म सी,
शीत सम सम्भावना।
 
   

रविवार, 17 मार्च 2013

वनदेवी

ऋग्वेद का उषा सूक्त विश्वप्रसिद्ध है लेकिन इस तथ्य को बहुत कम रेखांकित किया गया है कि वनदेवी अरण्यानी के लिये भी उतनी ही सुन्दर ऋचायें गायी गयी हैं। दसवें मंडल के 146 वें सूक्त की 6 ऋचाओं की कविता अद्भुत है और वाल्मीकि के ऋतुवर्णनों सा सौन्दर्य लिये हुये है। मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ:
 
वन वन भटकती ओझल होती हे वनदेवी!
क्यों न तुम भय खाती न पूछती गाँव का पता!
उत्तर देता टिड्डा जब झिंगुर झंकार की उठान का 
उल्लसित होती है वनदेवी घंटियों के स्वर सी हिलमिल।
और सामने पशु जो दिखते चरते से निज परिवेश
स्यात साँझ को वनदेवी ने खोल दिये छकड़े के बन्ध!
गिरा दिया वृक्ष किसी ने हाँक पार रहा कोई गैया
उतरी साँझ में वनबटोही समझ रहा चीख किसी की!
वनदेवी कभी न हनती जब तक न आये अरि हत्यातुर
खा कर सुगन्धित इच्छित फल जन लेते विश्राम ठहर।
मैंने कर ली स्तुति अब अंजनगन्ध सुरभित वनदेवी की
माता है जो मृगकुल की कृषि से दूर पर भोजन भरपूर।
 
 
aranyani

शुक्रवार, 15 मार्च 2013

वक़्त वक़्त की बात

वक़्त वक़्त की बात 
कहीं से उठता है धुँआ
यूँ ही ढाँढ़स देने को 
जला दी गयी घुन खाई लकड़ियों से।

अन्नपूर्णा के खाली भंडार 
बरतनों में बजते हैं 
भूख बुझती नहीं
पानी पेट मरोड़ता है।

बुझती है आँसुओं से आग
पेट की,मन की -
कवि रचता है
बड़वाग्नि उपमा उपमान।

रविवार, 10 मार्च 2013

खेलें मसाने में होरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी


खेलें मसाने में होरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी 
भूत पिशाच बटोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी।  
लखि सुन्दर फागुनी छटा के
मन से रंग गुलाल हटा के
चिता भस्म भर झोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी।
गोप न गोपी श्याम न राधा
ना कोई रोक ना कवनो बाधा 
अरे ना साजन ना गोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी  
नाचत गावत डमरूधारी 
छोड़े सर्प गरल पिचकारी 
पीटें प्रेत थपोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी। 
भूतनाथ की मंगल होरी 
देखि सिहायें बिरज की छोरी 
धन धन नाथ अघोरी, दिगम्बर खेलें मसाने में होरी।  

रविवार, 3 मार्च 2013

नींद और देह



निंदिया लपक लड़ी!
पलकें झपक परीं
डालियाँ लचक परीं। 



शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

लो फिर बसंत आई

पाकिस्तान में भी वसंत पंचमी मनाई जाती है। लीजिये सुनिये मलिका पुखराज और ताहिरा सईद को ठाकुर Padm Singh के सौजन्य से।
______________

लो फिर बसन्त आई, लो फिर बसन्त आई, फूलों पे रंग लाई.
...लो फिर बसन्त आई, लो फिर बसन्त आई, फूलों पे रंग लाई...
चलो बे दरंग, लबे आबे गंग, बजे जलतरंग, मन पर उमंग छाई, 
लो फिर बसन्त आई , फूलों पे रंग लाई , 

आफत गई खिज़ां की, किस्मत फिरी जहाँ की,

चले मै गुसार, सूये लाला जार, मै पर्दादार, शीशे के दर से झाँकी ,
आफत गई खिज़ां की, किस्मत फिरी जहाँ की,
खैतों हर चरिंदा, खैतों हर चरिंदा, बागों का हर परिंदा ,
कोइ गर्म खेज, कोइ नगमा रेज़, सुब को और तेज़,
फिर हो गया है ज़िन्दा, बागों का हर परिंदा , 
खैतों का हर चरिंदा , धरती के बेल बूटे, 
अन्दाज़े नौ से फूटे, हुआ पख्त सब्ज़, मिला रख्त सब्ज़,
हैं दरख्त सब्ज़ , बन बन के सब्ज़ निकले ,
धरती के बेल बूटे, अन्दाज़े नौ से फूटे,
है इश्क भी, जुनूं भी, है इश्क भी, जुनूं भी, 
कहीं दिल में दर्द, कहीं आह सर्द, कहीं रंग ज़र्द ,
है यूँ भी और यूँ भी , मस्ती भी जोशे खूँ भी , 
है इश्क भी, जुनूं भी,

फूली हुई है सरसो , फूली हुई है सरसो, 
भूली हुई है सरसो , नहीं कुछ भी याद,
यूँ ही बामुराद, यूँ ही शाद शाद ,
गोया रहे कि बरसों, फूली हुई है सरसो,
भूली हुई है सरसो, इक नाज़्नीं ने पहने, इक नाज़्नीं ने पहने, 
फूलों के ज़र्द गहने, है मगर उदास, नही पी के पास,
घमो रंजो यास , दिल को पडे हैं सहने , इक नाज़्नीं ने पहने,
फूलों के ज़र्द गहने, लो फिर बसन्त आई, 
लो फिर बसन्त आई, फूलों पे रंग लाई, लो फिर बसन्त आई ,
फूलों पे रंग लाई, फूलों पे रंग लाई...

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

वे आयेंगे


वे आयेंगे, जब गीत मुरझायेंगे
होठों को सिकोड़ देंगी झुर्रियाँ
और नैन सूख जायेंगे
वे आयेंगे
मुस्कुराते हुये गायेंगे
मुकरियाँ
और हम न समझ पायेंगे!

लगन में बरखा


साँझ से रात भर
बरसते रहे मेह
नेह झर
सिसकता विदाई गात
नवजीवन सौगात
माँ ने बाँधे साथ
बरस रहा
धुल रही प्रात।

गुरुवार, 31 जनवरी 2013

तुम सुन्दर हो

सब कह गये सब कुछ तुम्हारी प्रशंसा में,
कुछ भी न बचा
मैं कहता हूँ - तुम सुन्दर हो,
इतनी सादी ईमानदारी से किसी ने न कहा
इतनी ईमानदार शादगी से किसी ने न कहा!

बुधवार, 30 जनवरी 2013

वो और रोटी चटनी स्वाद

वो ढूँढ़ ही लेती है
चटनी के उद्यम सामान
और तुम पाते हो
उसी रोटी में एक नया स्वाद।
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(चित्र स्रोत आभार: http://smalltowndiary.wordpress.com/2010/09/01/sil-batta/)

शनिवार, 26 जनवरी 2013

...

इस ठंड की आदत नहीं ये आनी जानी है 
शिकायतों सिसकियों में बस यही आसानी है।
ठिठुरते आह भरते हम सिहरते हैं 
गुलदश्ते आते जाते हैं हम बस वैसे ही रहते हैं 
कालिख पुते चेहरे पर पंखुड़ियाँ सजानी हैं 
गिरें धूल में कुचलें पाँव तले यही कहानी है।  

रविवार, 20 जनवरी 2013

नैहर आने से पहले कुछ बेटियाँ

नैहर आने से पहले कुछ बेटियाँ 
अब भी लिखती हैं अंतर्देसी चिट्ठियाँ।

बाबा धुलने को दे देते हैं
गन्दी अपनी धोतियाँ।
मोर्ही वाली छोड़ एक ग़ायब हो जाती हैं सभी
ताखे पर बिखरी किसिम किसिम की चुनौटियाँ
मुस्कुराते घूमते हैं कभी इधर कभी उधर
चुपके चुपके सहेजते हैं कहने को ढेरों कहानियाँ।

ईया गिरते केशों में 
फेरने लगती हैं कंघियाँ।
ढील खुजली हेरन बातों में बकबक फेरन को
माज माज मन चमकाती हैं मन मन भारी गालियाँ
जतन भर सँवारती हैं टुटहे बक्से में रखे आशीष
लेकिन नहीं भूलती हैं छिपाना अपनी बालियाँ।

ले खरहरा जाला मारें
पापा झाड़ें खिड़कियाँ।
पिटती है धौंक कुदारी दुअरा पर मोथा छीलन को
उमड़ उछाह देख पलायित बिदाई वाली सिसकियाँ
झोला भर लाते पापड़ चिउड़ा सिरका अमचूर
पूछ पूछ तस्दीकें घरनी से कैसे बनती हैं मछलियाँ?

पोते चेहरे की झाँइयों पर
छिपा बहुओं से लभलियाँ।
जोर जुटा जमा ठसक हो जाती है जवाँ पुन:
याद दिलाने लगती घरनी सुघर सराही झिड़कियाँ
कड़वी जीभ से परखे सब नकचढ़ ज़िद्दी मोर धिया          
छोड़ देती है तवे पर माँ फुलाना रोटियाँ।
  
गिनने लगते हैं मनसुख काका
चेहरे पर की झुर्रियाँ।
खिचड़ी मूँछ आवारा बाल चुभते हैं आँखों में
बात बेबात हजामत में देने लगते हैं झिड़कियाँ
बारी के सबुजा आम टिकोरे कीमती कचहरी कागद से
काटने को कच्चे कचालू चमकाने लगते हैं छूरियाँ। 

सहमने लगती हैं यूँ ही -
ननद के भाइयों से उसकी भाभियाँ
जब पढ़ती हैं चिकोटती सी चिट्ठियाँ। 


नैहर आने से पहले कुछ बेटियाँ
अब भी लिखती हैं अंतर्देसी चिट्ठियाँ। 

बुधवार, 9 जनवरी 2013

शांती बेवस्था बनाये रखिये।

शांती बेवस्था बनाये रखिये। 
"घुसपैठ भई तो सेना क्या कर रही थी?"खबीश को ये पूछने दीजिये। 
मने कि लाख टके का कोश्चन है, करने दीजिये।
खुद अपने को भूलने दीजिये।
मूड़ काटने वाले को काटने दीजिये। 
लैनतोड़वा को आगे से टीकस लेने दीजिये। 
घूस देते रहिये, काम चलाते रहिये।
मौका मिलने पर कमरा ओढ़ घीव पीते रहिये। 
परधान को सब ठीक है कहने दीजिये।
उनको फिर फिर गद्दी बैठाते रहिये 
और बेवस्था को गरियाते रहिये। 
शांती बेवस्था बनाये रखिये!